शनिवार, 18 अप्रैल 2009

वो इतने सुदर नहीं हैं जितनी सुंदर उनकी बीवी


यह कविता १९८४ में लिखी थी जब घरों में टीवी बहुत कम हुआ करते थे।

वो इतने सुदर नहीं हैं जितनी सुंदर उनकी बीवी।
बीवी की बदौलत ही उनको सब दिखलाते हैं टीवी।
सब दिखलाते हैं टीवी उनको बड़े आदर से बुलाते
कभी शरमाते सकुचाते तो कभी चुट कले सुनाते।
कहे प्रेम कविराय वो खुश हैं देख कर उनकी टीवी
टीवी वाले भी खुश हैं भइया देख कर उनकी बीवी।



7 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बढ़िया रचना प्रस्तुत करने के लिए आभार.

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  2. kya baat hai prem ji.........kuch alag hi rang liya hua hai .

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  3. हास्य के बहाने भारतीय पुरुषों के दिमाग की झाँकी दिखाने के लिये धन्यवाद!

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  4. भैय्या प्रेम जी।
    वो बीबी किसकी है।
    किस्मत बीबी और टीवी दोनो का साथ दे रही है।
    कविता अच्छी है।

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  5. बीबी और टी वी पर खूब हास्य रचनाएँ लिखी गयी थीं.एक हास्य रचना में कवि कहता है टी वी पहले ब्लैक एंड व्हाइट होती थी और अब कलर. बीबी शुरू में कलर होती है बाद में ब्लैक एंड व्हाइट.

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