बुधवार, 15 अप्रैल 2009

प्यार नहीं है तो जताता क्यों है






प्यार नहीं है तो जताता क्यों है।
सरे आम मुझको बनाता क्यों है।


माना कि जमाने मे बड़ा नाम तेरा
मगर मेरे दिलको जलाता क्यों है।

जुबान दी है तो उसे निभाओ भी
जुबान से सबको भरमाता क्यों है।


पीते वक्त जरा होश तो रखा कर
संभाल खुदको लड़खडाता क्यों है।


अपनी अक्ल अपने पास ही रख
हमेशा गैरों को समझाता क्यों है।


अपनी नज़र में सभी चतुर होते
खुदको बड़ा चतुर बताता क्यों है।





4 टिप्‍पणियां:

  1. रचना बहुत अच्छी लगी,बधाई।
    मैनें आप का ब्लाग देखा। बहुत अच्छा
    लगा।आप मेरे ब्लाग पर आयें,यकीनन अच्छा
    लगेगा और अपने विचार जरूर दें। प्लीज.....
    हर रविवार को नई ग़ज़ल,गीत अपने तीनों
    ब्लाग पर डालता हूँ। मुझे यकीन है कि आप
    को जरूर पसंद आयेंगे....
    - प्रसन्न वदन चतुर्वेदी

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  2. झूठ के प्यार को, दुनिया को जताता क्यों है?
    सब्ज गुलशन में, बहारों को जलाता क्यों है?
    शोख कलियों को, जरूरत नही अब तेरी,
    बे-शरम बन के, नजारों को दिखाता कयों है?

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  3. अपनी नज़र में सभी चतुर होते
    खुदको बड़ा चतुर बताता क्यों है।

    -बहुत सही बात कही!! आनन्द आया पढ़कर.

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