मंगलवार, 7 अप्रैल 2009

घर से चली वो जब अपने दफ्तर को



घर से चली वो जब अपने दफ्तर को
बीच राह में बरसो पानी बड़ी जोर है।

ऊपर से नीचे तक भीग गए सारे अंग
सारा बदन पानी में हुआ सारा बोर है।

अंग अंग झलक उठे मस्ती टपक पड़ी
लोगों की मस्ती का न रहा छोर है।

ख़ुदको ही देख लजाई अपने आप में
दबे पाँव चुप चाप चली घर ओर है।

5 टिप्‍पणियां:

  1. गरमी के मौसम में बारिश की बात।
    सोचा तो मन में उठने लगा शोर है।।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
    कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।
    www.manoramsuman.blogspot.com
    shyamalsuman@gmail.com

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  2. बहुत सुंदर रचना ... मुझे अच्‍छी लगी।

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  3. ek alag hi nazariye se likhi gayi kavita bahut gahre bhav de rahi hai.

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