बुधवार, 1 अप्रैल 2009

सोलह श्रंगार करके खुदको सजाया



सोलह श्रंगार करके खुदको सजाया
उसके काबिल मैंने खुदको बनाया
कहके बेदर्दी न आया
पागल मुझको बनाया

दो दिन से आंखों की नीदें उडी थी
मिलन की उससे उम्मीदें जुड़ी थी
उम्मीदों पे पानी फिराया
पागल मुझको बनाया

मन की बात मेरी मन में ही रह गई
तन की आग मेरी तन में ही रह गई
तन मन उसने जलाया
पागल मुझको बनाया

परदेश जाके परदेशी हो गया वो
जाने किसके चक्कर में खो गया वो
जो मुझको ऐसे भुलाया
पागल मुझको बनाया

4 टिप्‍पणियां:

  1. वाह वाह प्रेम साहब, क्या ग़ज़ब कहा !
    मन की बात मेरी मन में ही रह गई
    तन की आग मेरी तन में ही रह गई

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  2. "परदेश जाके परदेशी हो गया वो
    जाने किसके चक्कर में खो गया वो
    जो मुझको ऐसे भुलाया
    पागल मुझको बनाया"
    प्रेम जी!
    पागल न बने।
    1 अपैल बीत गयी है।
    अब आप भी उसका ख्याल अपने मन से निकाल ही दें।
    वन-वे पर बहादुरी से चलने के लिए धन्यवाद।

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  3. kya baat hai prem ji
    aaj to likhne ka style alag hai
    prem ka ek alag hi andaz prastut kar diya.
    waah waah

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