मंगलवार, 28 अप्रैल 2009

अपने दिल में बिठा लिया है मेरे यार ने मुझे



अपने दिल में बिठा लिया है मेरे यार ने मुझे।
जिन्दगी जीना सिखा दिया है मेरे यार ने मुझे।


मैं तो होशो हवास खो के जी रहा था जिन्दगी
जिन्दगी से ही मिला दिया है मेरे यार ने मुझे।


मोहब्बत से ही महकती है ये जिन्दगी जहाँ में
मोहब्बत का सिला दिया है मेरे यार ने मुझे।


अब क्यों करूं परवाह जमाने भर की बतलाओ
भई फूल सा खिला दिया है मेरे यार ने मुझे।

रविवार, 26 अप्रैल 2009

इस दुनिया में आके, दिल से दिल लगाके



इस दुनिया में आके, दिल से दिल लगाके
जिसने प्यार न किया,उसने यार न जिया

झूम लो गा लो, मौज मना लो
इस जीवन को, रंगीन बना लो
कुछ न मिलेगा जग में,याद रखो, शरमाके
जिसने प्यार न किया, उसने यार न जिया

लेने से अच्छा, प्यारे देना सीखो
रोने से अच्छा, गर हँसना सीखो
रोने वाला क्या पायेगा, रो के और रुलाके
जिसने प्यार न किया,उसने यार न जिया

देखो दिल न तोड़ो,कभी किसी का
सीख लो प्यारे, जीने का सलीका
ऐसा न हो जाना पड़े, दुनिया से पछताके
जिसने प्यार न किया,उसने यार न जिया

इस दुनिया में आके, दिल से दिल लगाके
जिसने प्यार न किया,उसने यार न जिया

शनिवार, 25 अप्रैल 2009

मुझको हो गया है प्यार आज कल



मुझको हो गया है प्यार आज कल
दिलको आ गया है करार आज कल।

उसको देखूं तो जाने क्यों देखता रहूँ
कुछ भी करने को तैयार आज कल।

खूब करता हूँ दिलकी बात दिलवर से
दिलपे छाया एक दिलदार आज कल।

दौड़ने लगा मुझमें बिजली का करंट
बिजली से जुडा जैसे तार आज कल।

उसके ही ख्यालों में अब डूबा रहता
हमेशा रहे उसका इंतज़ार आज कल।

डूबे हुए हम दोनों अखरस बतरस में
छूने को दोनों ही बेकरार आज कल।



रविवार, 19 अप्रैल 2009

पैरोडी राम बनके कभी श्याम बनके


कभी माता बनके
कभी पिता बनके
चले आना गुरूजी चले आना।

तुम दीपक रूप में आना
तुम दीपक रूप में आना
तम को दूर करने
मुझमें नूर भरने
चले अना गुरु जी चले आना

तुम रक्षक रूप में आना
तुम रक्षक रूप में आना
मेरी रक्षा करने
प्यार सच्चा करने
चले आना गुरु जी चले आना।

तुम आत्म रूप में आना
तुम आत्म रूप में आना
अपनी भक्ति जगाने
अपनी शक्ति दिखाने
चले आना गुरु जी चले आना।

तुम माझी रूप में आना
तुम माझी रूप में आना
भव से पार करने
मेरा उध्दार करने
चले आना गुरु जी चले आना।

तुम सपन रूप में आना
तुम सपन रूप में आना
मुझको राह दिखाने
मुझमें चाह जगाने
चले आना गुरु जी चले आना।

बड़े दिनों के बाद मिली उनकी चिट्ठी आज


बड़े दिनों के बाद मिली उनकी चिट्ठी आज।
सच पूछो तो मेरी सहेली खुल गए मेरे भाग।
खुल गए मेरे भाग जरा इसको पढ़ के सुनाओ
क्या- क्या लिखा है इसमें मुझको बतलाओ।

कहे प्रेम कविराय बोली सहेली न हो बेकरार
कल आ रहे हैं वो तेरे और तुझको भेजा प्यार।

सुन कर इतनी बात खुश वो इतनी हो गई।
हाय पल भर में ही वो न जाने कहाँ खो गई।
न जाने कहाँ खो गई चिट्ठी दिल से लगाये
बोली कल आ जायेंगे मेरे वो मेरी सहेली हाय।
कहे प्रेम कविराय मिलन अब तो होगा उनका
भाई देर सुबह तक सोयेंगे वो दोनों बे खटका।


शनिवार, 18 अप्रैल 2009

वो इतने सुदर नहीं हैं जितनी सुंदर उनकी बीवी


यह कविता १९८४ में लिखी थी जब घरों में टीवी बहुत कम हुआ करते थे।

वो इतने सुदर नहीं हैं जितनी सुंदर उनकी बीवी।
बीवी की बदौलत ही उनको सब दिखलाते हैं टीवी।
सब दिखलाते हैं टीवी उनको बड़े आदर से बुलाते
कभी शरमाते सकुचाते तो कभी चुट कले सुनाते।
कहे प्रेम कविराय वो खुश हैं देख कर उनकी टीवी
टीवी वाले भी खुश हैं भइया देख कर उनकी बीवी।



शुक्रवार, 17 अप्रैल 2009

जिस थाली में खाता वो उसी में छेद कर देता



जिस थाली में खाता वो उसी में छेद कर देता।
पता अगर चल जाए तो प्रकट खेद कर देता।


सोच समझ कर ही वो दोस्ती का हाथ बढाता
प्यार जताता इतना की दो दिल एक कर देता।


अपना अपना कह कर जिसको वो अपना बनाये
पता ही नही चलता उसको मटिया मेट कर देता।


प्यार मोहब्बत से मिलके जो अपना जीवन जीते
उनके दिल का दिलवर बनके उनमें भेद कर देता।


बेशर्मी की सारी सीमायें उस से शरमा जाती हैं
दांत निपोर के अक्सर आगे अपना पेट कर देता।



वो अपने शहर में आबाद है उसे क्या



वो अपने शहर में आबाद है उसे क्या।
उसकी वजह कोई बरवाद है उसे क्या।



जब भी बोलता है तो बोलता ही रहता
कौन हुआ उस से नाशाद है उसे क्या।


समझाओ तो समझने को तैयार नहीं
समझे ख़ुदको वो उस्ताद है उसे क्या।

जो भी उसको भाता बस वही करता
अपनी नज़र में आजाद है उसे क्या।

बैठ गया वो कुर्सी पर करने को फैसला
भले ही करे कोई फरियाद है उसे क्या।



गुरुवार, 16 अप्रैल 2009

जब से तुझसे आँख मेरी लड़ गई रे



जब से तुझसे आँख मेरी लड़ गई रे
बिना पिए जैसे मुझे चढ़ गई रे


छुप कर तुझको देखने लगा हूँ
आँखें अपनी सेकने लगा हूँ
दिल की अंगूठी में तू जड़ गई रे।


रात भर मैं जगने लगा हूँ
ठंडी आहें भरने लगा हूँ
निंदिया मेरी आंखों से उड़ गई।


कुछ भी मुझको भाता नहीं है
समझ में कुछ भी आता नहीं है
तेरी चाहत में हालत बिगड़ गई रे।


बुधवार, 15 अप्रैल 2009

प्यार नहीं है तो जताता क्यों है






प्यार नहीं है तो जताता क्यों है।
सरे आम मुझको बनाता क्यों है।


माना कि जमाने मे बड़ा नाम तेरा
मगर मेरे दिलको जलाता क्यों है।

जुबान दी है तो उसे निभाओ भी
जुबान से सबको भरमाता क्यों है।


पीते वक्त जरा होश तो रखा कर
संभाल खुदको लड़खडाता क्यों है।


अपनी अक्ल अपने पास ही रख
हमेशा गैरों को समझाता क्यों है।


अपनी नज़र में सभी चतुर होते
खुदको बड़ा चतुर बताता क्यों है।





मंगलवार, 14 अप्रैल 2009

चूड़ी पहनन को सखी इक दिन गई बज़ार


चूड़ी पहनन को सखी, इक दिन गई बज़ार।
मसल-मसल हाथ मेरा, मस्त हुआ मनिहार।
मस्त हुआ मनिहार, मस्त मैं भी कुछ न कम थी
कुछ कहने सुनने की, न मुझमें न उसमें दम थी।
कहे प्रेम कविराय, वो ऐसे झनझनाये। 
जैसे-तैसे दोनों, फ़िर ख़ुदको समझा पाये।

जानू न मैं ये जाने न तू ये




जानू न मैं ये
जाने न तू ये
कब हो गया अपना प्यार
कहता है अंग अंग
रहना अब तेरे संग
सातों जन्म मेरे यार।

जब भी हम मिलते
मिलकर के खिलते
झूठ नहीं हम
कहते हैं दिलसे
देखो इन आंखों में
देखो इन साँसों में
छाया है तेरा खुमार।

मैं तेरे काबिल
तुम मेरे काबिल
जीवन हो जीवन
गर तुम हो हासिल
अब मैं हूँ तुझ से
अब तुम हो मुझ से
दिलवर मेरे दिलदार।

साथ जिऊंगा
साथ मारूंगा
जो तुम कहोगी
वो ही करूंगा
सुन जाने जाना
मैं हूँ दीवाना
तुझे पाने को बेकरार।


शनिवार, 11 अप्रैल 2009

पहले नज़र मिली फ़िर उस से बात हो गई।


पहले नज़र मिली फ़िर उस से बात हो गई।
धीरे धीरे जाने कब वो हम ख्यालात हो गई।

जरूर होगा ऊपर वाले का मुझपे रहमो करम
जिसकी तलाश थी उसी से मुलाकात हो गई।

कट रहे दिन रात मेरे मस्तियों में आज कल
मस्त मस्त अब तो मेरी हर एक रात हो गई।

एक दूसरे पर खुशी से खुशी लुटा रहे हैं हम
हम डाल डाल पर और वो पात पात हो गई।

मंगलवार, 7 अप्रैल 2009

आवहु तुम्हें बतावें अपने दिल की बात सहेली


आवहु तुम्हें बतावें अपने दिल की बात सहेली।
करवट बदल बदल कर रात लेटी रही अकेली।
रात लेटी रही अकेली सहेली मैं बिना पिया के
विरह के बस हो गए टुकड़े मेरे लाख जिया के।
कहे प्रेम कविराय सहेली कुछ तो जतन बतावहु
तुम ही को लें भर भेंट सहेली पास में आवहु।

घर से चली वो जब अपने दफ्तर को



घर से चली वो जब अपने दफ्तर को
बीच राह में बरसो पानी बड़ी जोर है।

ऊपर से नीचे तक भीग गए सारे अंग
सारा बदन पानी में हुआ सारा बोर है।

अंग अंग झलक उठे मस्ती टपक पड़ी
लोगों की मस्ती का न रहा छोर है।

ख़ुदको ही देख लजाई अपने आप में
दबे पाँव चुप चाप चली घर ओर है।

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2009

मतदाताओ


मतदाताओ
किसी का  न भय करो,अपना नेता तय करो
तभी उसकी जय करो,तभी 
उसकी जय करो
आओ मिलके चुने हम सब नेता अब भले
जीवन और देश अपना जिनसे ढंग से चले
आँख बंद कर आख़िर कब तक सोते रहोगे
अपनी किस्मत पे भला कब तक रोते रहोगे

सदा से ही झूठे वादों से हम लपेटे गए हैं
अक्ल से अपने आप में हम समेटे गए हैं
सबकी सुनके कभी नीति भी अपनी बनाओ
दिखावा छोड़ वोटर अपनी भी अक्ल लगाओ

डरने की तो प्यारे कहीं कोई बात नहीं है
जीने मरने में होता कभी कोई साथ नहीं है
जैसा हो माहौल तुम्हारा वैसे ही ढल जाओ
जो सब के ही हित में हो वैसे चल जाओ

सबका हित जो चाहे सचमुच नेता है वही
हित कहे अहित करे वो अपना नेता है नहीं
जब तक न बदलोगे प्यारे कुछ भी न बदलेगा
सिर्फ़ जीवन का दुःख दर्द आँखों से छलकेगा


बुधवार, 1 अप्रैल 2009

सोलह श्रंगार करके खुदको सजाया



सोलह श्रंगार करके खुदको सजाया
उसके काबिल मैंने खुदको बनाया
कहके बेदर्दी न आया
पागल मुझको बनाया

दो दिन से आंखों की नीदें उडी थी
मिलन की उससे उम्मीदें जुड़ी थी
उम्मीदों पे पानी फिराया
पागल मुझको बनाया

मन की बात मेरी मन में ही रह गई
तन की आग मेरी तन में ही रह गई
तन मन उसने जलाया
पागल मुझको बनाया

परदेश जाके परदेशी हो गया वो
जाने किसके चक्कर में खो गया वो
जो मुझको ऐसे भुलाया
पागल मुझको बनाया