मंगलवार, 17 मार्च 2009

अपनी क्षमता से जादा क्यो दौड़ने लगे हो


अपनी क्षमता से जादा क्यो दौड़ने लगे हो।
घबराके जीवन से नाता क्यो तोड़ने लगे हों।

अच्छे अच्छों का जीवन में वक्त बदलता है
दुखी होकर अपना माथा क्यो ठोकने लगे हो।

जरूरी नहीं कि हमेशा मन का ही होता जाए
फ़िर पागलो की तरह क्यो भौंकने लगे हो।

राज ए दिल को दिल में ही छुपाये रखिये
बहक कर राज ए दिल क्यो खोलने लगे हो।

जब तक निभे निभादों साथ अपनी तरफ़ से
नहीं निभे छोडो जहर क्यो घोलने लगे हो।

दुश्मन बोलना चाहे समझो दाल में काला है
सब भूल के उसके साथ क्यो डोलने लगे हो।

मन की जिन्दगी कहाँ मिलती सब को यहाँ
गैरों पे किस्मत का भांडा क्यो फोड़ने लगे हो।



3 टिप्‍पणियां:

  1. गैरों पर अपनी
    किसमत का
    भांडा क्यो
    फोड़ने लगे हो।

    -क्या बात कही है, प्रेम भाई. आपका ईमेल भी मिल गया. बहुत आभार.

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  2. प्रेम जी
    बहुत सुंदर ग़ज़ल कि पोस्ट है,
    ऐसा लगा जैसे किसी ने सच्चाई को
    बीच चौराहे पर लाकर रख दिया हो.
    बहुत बहुत बधाई
    - विजय

    जब तक निभे निभादों साथ अपनी तरफ़ से
    नहीं निभे छोडो जहर क्यो घोलने लगे हो।

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